Wednesday, April 9, 2008

मोदी की किताब


गुरू की किताब आए तो चेला पीछे कैसे रहे.

नरेंद्र मोदी की किताब ज्योति पुंज जारी होने वाली है. इसे आरएसएस के महासचिव मोहन भागवत जारी करेंगे.

इस किताब में मोदी ने आरएसएस के कुछ जाने तो कुछ अनजाने चेहरों की कहानी लिखी है.

हालांकि लोगों को उम्मीद थी कि मोदी एक किताब ये भी लिखें कि आखिर उन्हें गुजरात में लगातार दो बार जीत किस तरह हासिल हुई.

वो ये भी बताएं कि गोधरा कांड के बाद हुए दंगों की असली कहानी क्या है. क्या इसी वजह से उन्हें जीत मिली.

सोहराबुद्दीन की मुठभेड़ का मामला क्या है. मौत के सौदागर के सोनिया गांधी के बयान का जवाब देने की रणनीति उन्होंने कैसे तैयार की.

क्यों उन्होंने अपने चुनाव प्रचार में सिवाए अपने किसी का नाम नहीं लिया. क्यों उनके भाषणों में खुद का नाम पचास बार तो बीजेपी का नाम पांच बार आता रहा.

आरएसएस से रिश्ते

नरेंद्र मोदी ने शुरूआत पूर्णकालिक प्रचारक से की. यानी आरएसएस के वो सदस्य जो अपना सब कुछ छोड़ कर संगठन के लिए पूरी तरह से समर्पित हो जाते हैं.

गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद और गोधरा कांड और उसके बाद हुए दंगों के बाद मोदी हिंदू ह्रदय सम्राट के रूप में पेश किए गए.

पूरे संघ परिवार ने भी उन्हें बेहद पसंद किया. संघ को लगा कि कल्याण सिंह, उमा भारती के बाद अब उन्हें असली पोस्टर बॉय मिल गया है.

फिर मोदी के संघ के साथ रिश्ते बिगड़ने शुरू हुए. शुरूआत हुई भारतीय किसान संघ के आंदोलन से. तब गुजरात पुलिस ने बीकेएस के दफ्तर में घुस कर हेड़गेवार और गोलवलकर की तस्वीरों को सड़क पर फेंक दिया.

फिर संजय जोशी की कथित सेक्स सी़डी आई. इस सीडी ने एक अच्छे भले नेता का करियर बर्बाद कर दिया.

प्रवीण तोगड़िया ये कहते फिरे कि ३२ लोगों की सीडी बनवाई गई. उन्होंने मोदी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.

वीएचपी, भारतीय किसान संघ, बजरंग दल और यहां तक कि आरएसएस का गुजरात का एक बड़ा तबका मोदी के खिलाफ हो गया.

इसके बावजूद नरेंद्र मोदी जीते. उनकी जीत से साफ हो गया कि उन्होंने अपना कद पार्टी और संगठन से ऊपर कर लिया. उन्होंने अपने वैचारिक परिवार को दिखा दिया कि व्यक्तित्व का करिश्मा सब पर भारी पड़ता है.

लेकिन इसके बावजूद अब वो आरएसएस से अपने संबंध सुधारने में लगे हैं. क्योंकि उन्हें आडवाणी के बाद बीजेपी का नेता कहा जाने लगा है, वो भी ये जानते हैं कि बिना संघ के आशीर्वाद के वो आगे नहीं बढ़ सकते. ज्योतिपुंज इसीलिए सामने आ रही है.

चीन के तीन टी


ये तस्वीर चीन की दीवार की है। अभी मुश्किल से तीन महीने पहले वहां गया था।

आज पूरी दुनिया मे ओलम्पिक मशाल के चर्चे हैं। कही इसे छीना जा रहा है और कही इसे बुझाने की कोशिश की जा रही है।
भारत में ये मशाल आ रही है। चीन ओलम्पिक के बहाने अब ये साबित करने में लगा है कि तिब्बत पर उसका कब्ज़ा जायज़ है।
मेरी चीन यात्रा में मेरे साथ रही ट्रांसलेटर ने चीन के बारे में कुछ बेहद दिलचस्प बातें बताईं।

पहली तो ये कि वो मंगोलियन थी. इसमें दिलचस्प बात ये थी कि चीन की दीवार मंगोलियाई आक्रमण को रोकने के लिए बनाई गई थी।
लेकिन उसने कहा कि दीवार ने किसी जमाने में मंगोलियाईयों को दूर ज़रूर रखा होगा लेकिन अब वो बड़ी संख्या में चीन में ही हैं। ये उसके हिसाब से बदलते वक़्त की निशानी है।

फिर भी, चीन में अगर कुछ नहीं बदला है तो वो है तीन टी.
तीन टी यानी तिब्बत, ताईवान और थ्यानमन चौक।

पहले दो साम्यवादी चीन के साम्राज्यवादी रवैये को बताते हैं तो तीसरा लोकतंत्र के प्रति उसकी विरक्ति और घृणा को.
इसीलिए बाईचंग भूटिया को सलाम करने को दिल चाहता है। और यही दिल आमिर खान से सवाल भी करना चाहता है।
आमिर खान कहते हैं कि वो मशाल लेकर दौड़ेंगे ज़रूर क्योंकि मशाल का सरोकार ओलंपिक से है। ये सिर्फ इत्तफाक है कि ओलंपिक इस बार चीन में हो रहे हैं।

लेकिन मशाल उनके हाथों में होगी और होंठों पर तिब्बत के लोगों के लिए दुआ होगी. दुआ के लिए हाथ नहीं उठेंगे. सिर्फ होंठ हिलेंगे.

ऐसी दुआ किस काम की। ये आपके और मेरे सोचने की बात है।

Tuesday, April 8, 2008

मनमोहन के बाद कौन?


अभी आम चुनाव में वक़्त है। ये कम से कम कांग्रेस पार्टी कहती है. लेकिन अंदर ही अंदर सभी राजनीतिक दलों ने चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं.

अभी सिर्फ़ दो पार्टियों के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार सामने आए हैं। पहला बीजेपी के लाल कृष्ण आडवाणी तो दूसरा बीएसपी की मायावती।

हमारे लोकतंत्र में वही होता है जिसकी उम्मीद किसी ने न की हो.


किसने सोचा था कि सन् २००४ में मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बनेंगे। आखिर तो सोनिया गांधी राष्ट्रपति भवन गई ही थीं. उन्हें कांग्रेस और यूपीए ने अपना नेता चुन ही लिया था. लेकिन आखिर में मनमोहन सिंह का नाम सामने आया.


चुनाव चाहे अक्तूबर नवंबर में हो या फिर अगले साल मई में। अभी इस सवाल का जवाब पक्के तौर पर नहीं दिया जा सकता है कि अगला प्रधानमंत्री कौन होगा.

फिर भी, कुछ नाम तो सामने हैं ही।

मनमोहन सिंह


ये सोनिया गांधी ही तय करेंगी कि यूपीए का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन होगा। मनमोहन सिंह का नाम इसलिए क्योंकि चाहे सरकार सोनिया गांधी ने चलाई हो लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी के बाद पांच साल तक गठबंधन की सरकार चलाने का सेहरा तो उन्हीं के सिर बंध रहा है.


वो इसलिए भी क्योंकि इस अर्थशास्त्री ने पिछले पांच साल में भारत को आर्थिक तरक्की के नए मुकाम पर पहुंचाया है।


अगले चुनाव में अगर यूपीए को बहुमत मिलता है तो मनमोहन सिंह का नाम सबसे आगे रहेगा।

राहुल गांधी


वो कांग्रेस पार्टी के घोषित युवराज हैं। पीएम इन वेटिंग हैं. मनमोहन सिंह ने भऱत की तरह नेहरू खानदान की खड़ाऊ संभाल कर रखी हैं क्योंकि उन्हें भी असली वारिस का इंतजार है.

कुछ हिस्सों को छोड़ दें तो हमारा लोकतंत्र ऐसे ही चलता रहा है।

कांग्रेस चुनाव से ठीक पहले उनका नाम प्रधानमंत्री पद के लिए चला कर एक बड़ा राजनीतिक दांव चल सकती है।

लाल कृष्ण आडवाणी

वो एनडीए की ओर से घोषित उम्मीदवार हैं। ये उनका आखिरी चुनाव भी है। उनका गठबंधन महंगाई, आतंकवाद और कथित अल्पसंख्यक तुष्टिकरण जैसे मुद्दे उठाएगा.


उनकी किताब आई है। माई कंट्री माई लाइफ़. उसके बारे में चर्चा कभी और करूंगा. लेकिन ये किताब बताती है वो प्रधानमंत्री बनने के लिए कितना बेचैन हैं.

अगर कांग्रेस राहुल गांधी का दांव चलती है तो अगले चुनाव में आडवाणी को अपने से आधी उम्र के नेता से मुकाबला करना होगा।

मायावती


देश के हर नेता की तरह वो भी प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं। अपनी इस इच्छा को छिपाती भी नहीं हैं.


उत्तर प्रदेश में अपने बूते पर सरकार बनाई है। ब्राह्मणों और दलितों को नया समीकरण बनाया है. अब इसी के बूते यूपी में लोक सभा की कम से कम पचास सीटें पाना चाहती हैं.


खिचड़ी सरकार बनने के आसार में मायावती अपनी इच्छा ज़रूर पूरा करना चाहेंगी। अगर प्रधानमंत्री न बनें तो कम से कम उपप्रधानमंत्री ही बन कर.


मुलायम सिंह यादव

जिस लालू यादव ने एक बार उनके प्रधानमंत्री बनने की राह में रोड़े अटकाए थे अब वो उनसे गलबईंया कर रहे हैं।


इसलिए नहीं कि वो उनको प्रधानमंत्री बनवाना चाहते हैं। बल्कि इसलिए कि यूपीए की स्थिति मजबूत हो सके.


लेकिन ये इस पर निर्भर करता है कि मुलायम यूपी में अपनी खोई ताकत पाते हैं या नहीं।


और आखिर में....

रामदास अठावले या उनके जैसा कोई और...
(क्योंकि जब एच डी देवेगौडा और इंदर कुमार गुजराल बन सकते हैं तो फिर कोई भी बन सकता है प्रधानमंत्री)

प्रवेश निषेध


लघु कथा

वहां लिखा था- कृपया भगवानजी की मूर्तियों को टीका-सिंदूर न लगाएं. हनुमान जी की प्रतिमा के इश्तहार में लिखा था-कृपया महिलाएं मूर्ति को न छुएं.

ये मंगलवार का दिन है. श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ती जा रही है. साड़ी आगे खड़ी है उसके पीछे जींस. मज़ाल है कि मंदिर की चौखट पार कर जाएं. हनुमानजी को छूना तो दूर की बात.

मंदिर की सीढ़ियों पर बच्चों की भीड़ है. लेकिन जींस सलवार कमीज़ नहीं. गंदे, मैले-कुचैले बच्चे. प्रसाद की आस में. आस-पास की बस्तियों से आए हुए.

अचानक शोर उठता है. एक बच्ची ज़ोर से रोने लगती है. आपा-धापी में उसे प्रसाद नहीं मिलता. कसूर उसके छोटे कद का है. उसके नन्हे हाथ उठते हैं लेकिन देने वाले के हाथों तक नहीं पहुंच पाते.

एक बड़ी गाड़ी आकर रुकती है. उससे मां-बहन की गालियां इन बच्चों के लिए. सालों ठीक से नहीं बैठ सकते. शोर क्यों कर रहे हो.

सीढ़ियों से चौखट तक. हर जगह प्रवेश निषेध.

मेरी कही

मित्रों,
मेरी कही पर आपका स्वागत है। करीब दो साल हो गए. सुनते-सुनते कान भी पक गए. सब कहते रहे कि कुछ लिखा करो. मैं लिखना भी चाहता रहा. लेकिन हो न सका. अब ब्लॉग के रूप में ये नया माध्यम मिला है. आप तक मेरी बात पहुंचाने का.


मेरी कही में आपको बहुत कुछ पढ़ने को मिलेगा. लेकिन ख़ासतौर से राजनीति और अंतरराष्ट्रीय विषयों पर. यही मेरी दिलचस्पी के विषय हैं.


आपको कई बार मेरी कही के ज़रिए नई जानकारी भी मिलेगी। आप इसका इस्तेमाल भी कर सकेंगे।


कृपया मेरा हौंसला बढ़ाएं। मेरी कही को अपनी सुनी बनाएं. इस ब्लॉग पर आएं और अपने दोस्तों को भी बताएं.


धन्यवाद,


अखिलेश शर्मा